भारत :- धर्मनिरपेक्ष या पंथनिरपेक्ष

ब्रिटिश राज खत्म होने के बाद भारत में परिस्थिति उत्पन्न हुई थी। भारत को निर्णय लेना था कि वह अपनी बहू संख्या आबादी के साथ जाए या अपनी आदिकाल से आ रही परंपरा सर्व धर्म समान की नीति के साथ आगे बढ़े ।भारत के संविधान निर्माताओं ने यह निर्णय लिया कि भारत का धर्म उसका संविधान होगा । वह सभी धर्म को समान रूप से आगे बढ़ने और उन्नति करने का मार्ग प्रदान करेगा , और सभी धर्मों का समान रूप से सम्मान करेगा ।।

संविधान में वर्णित अंग्रेजी भाषा में सेकुलर शब्द का अर्थ हिंदी में धर्मनिरपेक्ष और पंथनिरपेक्ष दोनों होता है । तो यह प्रश्न उठता है कि भारत क्या है ? धर्मनिरपेक्ष और पंथनिरपेक्ष । इस बात को समझने के लिए हम को सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि, पंथनिरपेक्ष, और धर्मनिरपेक्ष, होता क्या है?

पंथनिरपेक्ष=इसका आशय यह है कि कोई भी व्यक्ति या संस्था जोकि सरकार के अधीन है । अपने किसी भी निर्णय पर किसी पंथ का कोई भी प्रभाव नहीं पड़ने देगा । उसकी दृष्टि में सारे पंथ एक समान होंगे। और वह सारे धर्मों का सम्मान करेगा । और उन्हें आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करेगा । किसी धर्म या पंथ के विरुद्ध या उनकी नीति या आस्था के विरुद्ध किसी भी प्रकार का कार्य नहीं करेगा। यह भारतीय परंपरा के अनुसार है , पश्चिम में इसका अलग ही रूप सामने आता है जो कि इसके इतिहास के समांतर है।

धर्मनिरपेक्ष: : विश्व इतिहास में कई ऐसी घटनाएं हुई जिनकी प्रतिक्रिया स्वरूप इस शब्द की उत्पत्ति हुई । यूरोप की सभ्यता में जब चर्च का वर्चस्व था। तब वहां की कुरीतियों और कुशासन और अत्याचार के विरुद्ध वहां की जनता ने आवाज उठाई और एक क्रांति का जन्म हुआ । जिसे हम फ्रांस की क्रांति के नाम से जानते हैं । तब वहां की जनता ने धर्म को एक अलग ही रूप से वर्णित किया वहां की संस्थाओं और सरकारों में धर्म का कोई स्थान नहीं है । सारी संस्थाएं धर्म के विरोध के आधार पर ही खड़ी हुई हैं , इसलिए वहां धर्मनिरपेक्ष का अर्थ किसी भी धर्म और शासन और संस्था से अलग रखना ।

‘जब हमारी बुद्धिजीवी इस बात की वकालत करते हैं कि भारत धर्मनिरपेक्ष है तो हमें यह समझना आवश्यक है कि भारत के संविधान निर्माताओं के मन में इस बात को लेकर कोई भी प्रश्न नहीं था कि भारत किस प्रकार का शासन उपलब्ध कराएगा इसलिए उन्होंने इस शब्द का जिक्र संविधान या उसकी प्रस्तावना में नहीं किया। क्योंकि यह तो उसके निर्माण में ही छिपा हुआ था किंतु कुछ वर्षों पश्चात इस बात की आवश्यकता हुई कि कहीं कोई इस बात का गलत फायदा न उठा ले और जनता को गलतफहमी ना हो इसके लिए स्वर्गीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी ने संविधान के 42 में संशोधन के द्वारा samajwad aur secular शब्द को संविधान में जोड़ा अथातो उसकी प्रस्तावना में निहित किया। इसलिए भारत का धर्मनिरपेक्ष पश्चिम सभ्यता से बिल्कुल अलग है भारत के समाज में जो आज टकराव की स्थिति का जन्म कहां है वह इस बात को ना समझने से है गांधी जी द्वारा दिखाया गया मार्ग और उनके द्वारा किया गया आचरण ही भारत का धन निरपेक्ष है आधार व्यक्तिगत आधार पर धर्म और राष्ट्र के आधार पर धर्म के होने पर भेद है यह बात सच है कि भारत एक हिंदू बहुसंख्यक देश है किंतु सदियों से हमने धर्मनिरपेक्ष किस सिद्धांत का पालन किया हैजो लोग इस बात पर प्रश्न करते हैं कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष नहीं है उनको यह बात समझना अति आवश्यक है समाज में होने वाले अति सूक्ष्म तनाव के आधार पर एक पूरी सभ्यता को ही कटघरे में खड़ा कर देना उचित नहीं है भारत का समाज इस समय एक समुद्र मंथन के दौर से गुजर रहा है उम्मीद है अमृत अवश्य निकलेगा।।

Published by Saurabh sharma

MSc (physics) Bloger .UPSC aspirant . future politician.

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